Saturday, February 10, 2024

तमन्ना-ए-रुसवाई

 कभी बैठ जा, बिन कुछ कहे, 

मेरी तन्हाई पूरी कर

कभी रूठ जा, गुस्सा भी तो हो, 

तमन्ना-ए-रुसवाई पूरी कर


ज़िन्दगी बहुत खुशनुमा हो तो सच्ची नहीं लगती

शक्कर हर वक़्त खाने में अच्छी नहीं लगती 


थोड़ा खट्टा, तीखा, मसालेदार तो लाओ

जो मेरी अपनी ही ज़ुबान से है, वो लड़ाई पूरी कर

तमन्ना-ए-रुसवाई पूरी कर 


जब ढल जाता है सूरज, तभी तो रात आती है

पहले आते काले बादल, फिर ही बरसात आती है


वो अँधेरा अपने संग, काले जज़्बात लाएगा

जो मेरे अंदर है बसी, वो परछाई पूरी कर

तमन्ना-ए-रुसवाई पूरी कर


मना लूँगा तुझे, शायर यही समझाता है

पतझड़ के बाद हमेशा वसंत आता है


कुछ गीत, कुछ खत, कुछ ग़ज़लें बाकी है

इन अधूरे पन्नो पर, मेरी लिखाई पूरी कर

तमन्ना-ए-रुसवाई पूरी कर

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