मचल उठा चंचल जंगल,
बजने लगे है ढोल प्रबल।
चहक चहक चिड़ियाँ है डोली,
गूँजी कोयल की बोली।
हर होंठ पर यही बात टंगी है,
आसमान में दौड़ लगी है !
घर से फिर दही-शक्कर खा कर,
बड़े-बुज़ुर्ग की आशीष पा कर,
निकले नन्हे पर-सवार,
उड़ने को तत्पर, तैयार,
खड़े हुए पंक्ति बनाये,
कौआ काका नियम बताये।
कि, "तिनका मुंह में दबाना है
और क्षितिज छूके आना है,
जो सबसे पहले लौट आएगा
वही विजयी कहलायेगा। "
इतने में गरुड़ पंक्ति तोड़
चल पड़ा धरा की ओर
जाने क्या मन में समाया था
पाँव ज़मीन पे जमाया था
पक्षी सभी बतियाने लगे
किस्से पुराने सुनाने लगे -
"हर साल इक ऐसा आता है
जो मनमौजी कहलाता है
जाने क्या मन को भाता है
पर उड़ना ना वो चाहता है। "
काका फिर कुछ सोच-समझ कर
इक गहरी लम्बी साँस भरकर
चल पड़े पथ दिखलाने को
गरुड़ को समझाने को
कि, "पक्षी-धर्म तो उड़ने का है
ना भूतल से रह जुड़ने का है
माना बहुत कठिन है दौड़,
पर तू ना इससे मुख मोड़
तू उस गरुड़राज का बेटा है
जो तीन लोक विजेता है
"तू क्षितिज पार कर जाएगा
तू जीत जगत को आएगा
सोने के ख़ाब सजायेगा
तू पंखराज कहलायेगा !"
काका की बात अनसुनी सी कर
बोला ना वह कुछ भी तत्पर
मानो, ख़यालों में खोया है वो
अनजान सवालों में खोया है वो
बोला फिर वो बस यही
कि, "अभी कुछ है कमी कहीं !
"क्षितिज पार कर जाऊँ तो भी,
विश्व-विजयी कहलाऊँ तो भी,
उस पार ना आसमान होगा?
जगत पार ना जहान होगा ?
तब साहस कहाँ से लाऊँगा ?
क्या फिर उड़ान भर पाउँगा ?
"अभी ढूँढता हूँ तिनका अपना,
संजोऊँ जिसमे अनदेखा सपना
चोंच में उसे दबाकर के
उड़ जाऊँ पंख फैला कर के,
"फिर चाहे उड़ान छोटी ही हो
लाख चाहे खोटी ही हो
स्वर्ण-महल चाहे ना हो
विश्व-प्रसिद्ध बाहें ना हो
पर बस इतना चाहूँ मैं
तिनके की कुटिया बनाऊं मैं
एक सहज संसार सजाऊँ मैं
स्वः इच्छा पर फैलाऊं मैं। "
कह इतना वो शांत हुआ
जाने कहाँ उद्भ्रांत हुआ
काका थे यह सुन स्तब्ध हुए
अंत मानो सब शब्द हुए
देखे थे टकटकी लगाए
लौटे फिर वो सर हिलाये।
"जैसे शैतानी साया हो
जिसमे बालक भरमाया हो
फैलाया जिसने माया जाल
बेतोड़ है जिसकी सारी चाल
अब ना किसी की सुनेगा वो
जाने क्या राह चुनेगा वो "
कह काका ने किया इशारा,
शोर में गूंजा अम्बर सारा,
हुई दौड़ शुरू और पक्षी भागे,
कठपुतलियाँ, अदृश्य धागे।
हर कोई ज़ोर लगता था,
अनंत में भागा जाता था।
फिर एक-एक कर हिम्मत हार,
अम्बर से गिरते पर-सवार।
और नीचे गरुड़ बैठा था ज्यों,
साधू बैठा तप मे हो,
अन्तर्मन में ध्यान लगाए,
ढूंढे जाने क्या उपाय,
या फिर बस समाज से दूर
था वो गहन निद्रा में चूर?
तोड़ फिर अपनी निद्रा घोर,
देखने लगा वो चारो ओर,
जैसे स्वतत्व का एहसास हुआ,
या प्रियजन का आभास हुआ,
फिर आँखे उसकी चमक उठी !
स्वयं दामिनी दमक उठी !
दूर कहीं भूतल पर ही,
पड़ी थी मानो जीवन-मणि !
चाँद ज़मीन पर आया हो,
या ब्रह्माण्ड समाया हो ,
या जैसे पाया था खुद को,
दौड़ा फिर वो सुध-बुध खो।
पर, तिनका अभी उठाया ही था
पर अपना फैलाया ही था
विपदा आन पड़ी फिर हाय
नियति तेरा क्या उपाय।
दैत्य राज फिर छोड़ पाताल
धरती पे चलते अपनी चाल
कुचल गरुड़ को रँगने लाल
हरने प्राण आया था काल।
डर से हर दिल पुकार उठा
अम्बर में हाहाकार उठा
बस, काका न कुछ दिखलाते थे
मानो, मंद-मंद मुस्काते थे
और मुस्काता था वो गरुड़राज
कर अंतिम क्षण में खुद पर नाज़।
कोई मुझको ये समझाए तो
क्यों इतना इतराये वो?
माना, तिनका पाया था
फिर जीवन भी तो गँवाया था !
पर आँखों की चमक, होंठो की हँसी
उससे ना दूर हो सकी।
और पर अभी भी फैले थे ज्यों
दुनिया से वो कहते हों,
कि, "एक हवा का झौंका आएगा
और ले मुझे उड़ जाएगा।"
अब वो सबसे दूर था,
पर चहरे पर इक नूर था,
जैसे उस पार की ज़िन्दगी,
हो यहाँ से तो बेहतर कई।
खैर, अब इतराता है तो इतराने दो,
फिर मन की कर जाने दो,
वो मनमौजी की तरह जिया,
उसे मनमौजी मर जाने दो।
बजने लगे है ढोल प्रबल।
चहक चहक चिड़ियाँ है डोली,
गूँजी कोयल की बोली।
हर होंठ पर यही बात टंगी है,
आसमान में दौड़ लगी है !
घर से फिर दही-शक्कर खा कर,
बड़े-बुज़ुर्ग की आशीष पा कर,
निकले नन्हे पर-सवार,
उड़ने को तत्पर, तैयार,
खड़े हुए पंक्ति बनाये,
कौआ काका नियम बताये।
कि, "तिनका मुंह में दबाना है
और क्षितिज छूके आना है,
जो सबसे पहले लौट आएगा
वही विजयी कहलायेगा। "
इतने में गरुड़ पंक्ति तोड़
चल पड़ा धरा की ओर
जाने क्या मन में समाया था
पाँव ज़मीन पे जमाया था
पक्षी सभी बतियाने लगे
किस्से पुराने सुनाने लगे -
"हर साल इक ऐसा आता है
जो मनमौजी कहलाता है
जाने क्या मन को भाता है
पर उड़ना ना वो चाहता है। "
काका फिर कुछ सोच-समझ कर
इक गहरी लम्बी साँस भरकर
चल पड़े पथ दिखलाने को
गरुड़ को समझाने को
कि, "पक्षी-धर्म तो उड़ने का है
ना भूतल से रह जुड़ने का है
माना बहुत कठिन है दौड़,
पर तू ना इससे मुख मोड़
तू उस गरुड़राज का बेटा है
जो तीन लोक विजेता है
"तू क्षितिज पार कर जाएगा
तू जीत जगत को आएगा
सोने के ख़ाब सजायेगा
तू पंखराज कहलायेगा !"
काका की बात अनसुनी सी कर
बोला ना वह कुछ भी तत्पर
मानो, ख़यालों में खोया है वो
अनजान सवालों में खोया है वो
बोला फिर वो बस यही
कि, "अभी कुछ है कमी कहीं !
"क्षितिज पार कर जाऊँ तो भी,
विश्व-विजयी कहलाऊँ तो भी,
उस पार ना आसमान होगा?
जगत पार ना जहान होगा ?
तब साहस कहाँ से लाऊँगा ?
क्या फिर उड़ान भर पाउँगा ?
"अभी ढूँढता हूँ तिनका अपना,
संजोऊँ जिसमे अनदेखा सपना
चोंच में उसे दबाकर के
उड़ जाऊँ पंख फैला कर के,
"फिर चाहे उड़ान छोटी ही हो
लाख चाहे खोटी ही हो
स्वर्ण-महल चाहे ना हो
विश्व-प्रसिद्ध बाहें ना हो
पर बस इतना चाहूँ मैं
तिनके की कुटिया बनाऊं मैं
एक सहज संसार सजाऊँ मैं
स्वः इच्छा पर फैलाऊं मैं। "
कह इतना वो शांत हुआ
जाने कहाँ उद्भ्रांत हुआ
काका थे यह सुन स्तब्ध हुए
अंत मानो सब शब्द हुए
देखे थे टकटकी लगाए
लौटे फिर वो सर हिलाये।
"जैसे शैतानी साया हो
जिसमे बालक भरमाया हो
फैलाया जिसने माया जाल
बेतोड़ है जिसकी सारी चाल
अब ना किसी की सुनेगा वो
जाने क्या राह चुनेगा वो "
कह काका ने किया इशारा,
शोर में गूंजा अम्बर सारा,
हुई दौड़ शुरू और पक्षी भागे,
कठपुतलियाँ, अदृश्य धागे।
हर कोई ज़ोर लगता था,
अनंत में भागा जाता था।
फिर एक-एक कर हिम्मत हार,
अम्बर से गिरते पर-सवार।
और नीचे गरुड़ बैठा था ज्यों,
साधू बैठा तप मे हो,
अन्तर्मन में ध्यान लगाए,
ढूंढे जाने क्या उपाय,
या फिर बस समाज से दूर
था वो गहन निद्रा में चूर?
तोड़ फिर अपनी निद्रा घोर,
देखने लगा वो चारो ओर,
जैसे स्वतत्व का एहसास हुआ,
या प्रियजन का आभास हुआ,
फिर आँखे उसकी चमक उठी !
स्वयं दामिनी दमक उठी !
दूर कहीं भूतल पर ही,
पड़ी थी मानो जीवन-मणि !
चाँद ज़मीन पर आया हो,
या ब्रह्माण्ड समाया हो ,
या जैसे पाया था खुद को,
दौड़ा फिर वो सुध-बुध खो।
पर, तिनका अभी उठाया ही था
पर अपना फैलाया ही था
विपदा आन पड़ी फिर हाय
नियति तेरा क्या उपाय।
दैत्य राज फिर छोड़ पाताल
धरती पे चलते अपनी चाल
कुचल गरुड़ को रँगने लाल
हरने प्राण आया था काल।
डर से हर दिल पुकार उठा
अम्बर में हाहाकार उठा
बस, काका न कुछ दिखलाते थे
मानो, मंद-मंद मुस्काते थे
और मुस्काता था वो गरुड़राज
कर अंतिम क्षण में खुद पर नाज़।
कोई मुझको ये समझाए तो
क्यों इतना इतराये वो?
माना, तिनका पाया था
फिर जीवन भी तो गँवाया था !
पर आँखों की चमक, होंठो की हँसी
उससे ना दूर हो सकी।
और पर अभी भी फैले थे ज्यों
दुनिया से वो कहते हों,
कि, "एक हवा का झौंका आएगा
और ले मुझे उड़ जाएगा।"
अब वो सबसे दूर था,
पर चहरे पर इक नूर था,
जैसे उस पार की ज़िन्दगी,
हो यहाँ से तो बेहतर कई।
खैर, अब इतराता है तो इतराने दो,
फिर मन की कर जाने दो,
वो मनमौजी की तरह जिया,
उसे मनमौजी मर जाने दो।
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