Saturday, June 1, 2019

आज जब बारिश की बूंदे फिर शीशे पे आ गिरी

आज जब बारिश की बूंदे फिर शीशे पे आ गिरी
तो बीते हुए कल में कहीं, एक नाव कोई चल पड़ी 

वो नाव बेशक कागज़ की थी, पर सपने सच्चे सहती थी 
और मेरे बचपन के मन को बहलाने के लिए बहती थी  

आज हाथ में कागज़ भी है, और बाहर पड़ी है बारिश भी 
आज बचपन का मन है, और नाव चलाने की खाहिश भी 

पर बीच में एक शीशा है, जो इसे मुझ तक आने न दे 
और मेरे भी कुछ बंधन है, जो मुझे इस तक जाने न दे 

तो बस कोसता हूँ इसे, कि कपड़े सारे भिगायेगी 
और फिर रस्तों पे कारों की कतारें लम्बी हो जाएँगी 

आज फिर बचपन के मन को, मैंने डाँट डपट बिठा दिया 
और इन बारिश की बूंदों को, शीशे से ही विदा किया 


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