Wednesday, June 10, 2020

अविरत

फूल गुलशन में लगायें हैं, लगे रहन दो
खाब आँखों में सजायें हैं, सजे रहन दो 

कांच की ये ज़िन्दगी, टूटेगी हाँ एक दिन 
इसमें अभी थोड़ी शराब, पड़े रहन दो

हाथों का छूटना, तो लाज़मी है जनाब 
डोर दिल से दिल की है, जुड़े रहन दो 

एक अरसा हुआ उन्हें देखे हुए अब 
यादों में मुस्कान को, बने रहन दो 

आज फिर वो गीत जब रेडियो पे आया 
दिल से फिर आवाज़ आयी, चले रहन दो  

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