Sunday, July 7, 2019

कभी निकले हो घर से यूँ?

कभी निकले हो घर से यूँ?
बिन जाने कहाँ जाने को,
बस, राह का साथ निभाने को!

इस सन्नाटे में छुपी जो बातें हैं,
ये पेड़, जो कुछ गुनगुनाते हैं,
इस ख़ामोशी से बतियाने को!
कभी निकले हो घर से यूँ?
बिन जाने कहाँ जाने को,
बस, राह का साथ निभाने को!

जब मंज़िल का ठिकाना न हो,
पर रुकने का का बहाना न हो,
चल दिए बस चल जाने को!
कभी निकले हो घर से यूँ?
बिन जाने कहाँ जाने को,
बस, राह का साथ निभाने को!

जब दूर तलक अँधेरा हो,
और आँखों में खाब-बसेरा हो,
उन खाबों को सजाने को!
कभी निकले हो घर से यूँ?
बिन जाने कहाँ जाने को,
बस, राह का साथ निभाने को!

मंज़िल बड़ी बेवफा है,
बस क्षण भर के लिए आती है 
और फिर आगे बढ़ जाती है। 
गर कर ले दोस्ती राह से तू,
ता-उम्र साथ निभाती है!
तो निकलो कभी घर से यूँ!
बिन जाने कहाँ जाने को,
बस राह का साथ निभाने को!

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